ख़ामोशी की गहराई
#shayari
Published on Sep 13, 2026 • PoetryKitaab Archive
जो बात कह न सके वो निगाहों में बयां थी, हर इक ख़ामोशी भी तेरी एक दास्तां थी। ढूंढते रहे जिसे हम महफ़िल-ए-शहर में, वो तन्हाई हमारे अपने ही दिल में रवां थी।
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